पर्यावरण संरक्षण के साथ रोजगार, हिमालयी इलाकों में सीबकथोर्न की नई पहल
देहरादून। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में किसानों की आय बढ़ाने के लिए प्रदेश सरकार औषधीय और पोषक तत्वों से भरपूर सीबकथोर्न फल के उत्पादन को व्यापक स्तर पर बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है। दुर्गम और सीमावर्ती इलाकों में सीमित खेती के विकल्पों के बीच सीबकथोर्न को आजीविका के मजबूत साधन के रूप में विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। पिथौरागढ़ जिले की दारमा, व्यास और चौदास घाटियों में इस दिशा में ठोस पहल शुरू हो चुकी है।
पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका
सीबकथोर्न न केवल औषधीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी इसकी बड़ी भूमिका मानी जाती है। इसकी मजबूत जड़ें पहाड़ी क्षेत्रों में भूमि कटाव को रोकने में मददगार हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रेतीली और ढलानदार जमीन पर यह पौधा प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करता है। व्यास घाटी के गरव्यांग गांव को सीबकथोर्न उत्पादन के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किए जाने की योजना है।
सरकारी सहयोग से बढ़ रहा दायरा
राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड की आर्थिक सहायता से वन विभाग पिथौरागढ़ जिले के धारचूला विकासखंड की दारमा, व्यास और चौदास घाटियों में सीबकथोर्न की खेती को प्रोत्साहित कर रहा है। हालांकि प्रदेश में इसका उत्पादन अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन बढ़ती मांग को देखते हुए इसे व्यवस्थित रूप से विस्तार देने की योजना बनाई जा रही है। वैश्विक स्तर पर चीन सीबकथोर्न का सबसे बड़ा उत्पादक है, जिससे इसके व्यावसायिक महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।
औषधीय गुणों से भरपूर फल
सीबकथोर्न को पोषक तत्वों का भंडार माना जाता है। इसका उपयोग खांसी, एलर्जी, त्वचा और नेत्र रोगों के उपचार में किया जाता है। इसमें विटामिन सी, ए, ई, के और बी समूह के कई विटामिन, एंटीऑक्सीडेंट, कैरोटिनॉयड, अमीनो एसिड और आवश्यक फैटी एसिड प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसके फल के साथ-साथ पत्तियों का भी औषधीय और न्यूट्रास्यूटिकल उपयोग किया जाता है।
कई गंभीर बीमारियों में उपयोगी
विशेषज्ञों के अनुसार सीबकथोर्न का उपयोग कैंसर, गुर्दा रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक माना जाता है। यही वजह है कि आयुर्वेदिक और न्यूट्रास्यूटिकल उद्योग में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
बाजार में ऊंची कीमत, किसानों को मिलेगा लाभ
सीबकथोर्न फल से तैयार जूस की कीमत बाजार में 500 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच चुकी है। सरकार का मानना है कि इसकी व्यावसायिक खेती से सीमावर्ती और उच्च हिमालयी क्षेत्रों के किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
रीप योजना के तहत बनेगी विस्तृत कार्ययोजना
ग्रामीण उद्यम वेग वृद्धि (रीप) योजना के तहत पर्वतीय जिलों में सीबकथोर्न की खेती को संगठित रूप से बढ़ावा देने की कार्ययोजना तैयार की जा रही है। पिथौरागढ़, चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और टिहरी के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में संभावनाओं का आकलन कर स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण और प्रोत्साहन दिया जाएगा। ग्राम्य विकास विभाग के सचिव धीराज गर्ब्याल के अनुसार, इस पहल से पहाड़ी क्षेत्रों में स्वरोजगार और सतत विकास को नई दिशा मिलेगी।